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बचपन की बेबसी
जीवन के सुनहरे अध्यायों का
पहला सबक बचपन,
पर मेरा बचपन भी
क्या बचपन था।
सूना सा एक गलियारा था,
न था कोई पल
खुशी का...बस
मौत सा मातम वहाँ था।
लाचारी, मजबूरी में ही बस
जीना ही सीखा था,
लगते सभी बेगाने थे
नहीं कोई अपना था।
न पूछो यह कि
कैसे समय बिताया था,
किसी तरह से मर-मर कर
अपने को जिलाया था।
पग-पग पर
अपमान का घूँट था पिया,
पर अपनी जिन्दगी को
खुदा की भेंट मानकर जिया।
फिर भी
क्या मिला इस जीने से?
लुटा गये हम सर्वस्य अपना
जीने की आस में।
बचपन की बेबसी को
जीने पर भी मिला
वही
शान्त, सूना सा गलियारा,
न था कोई शोर खुशी का,
न ही लहर किसी तरह की।
अब तो बस
जिये जा रहा हूँ
एक इसी चाह में,
कभी मिलने वाली खुशी की
और...एक आस
उस मातमी माहौल के हटने की,
दुख के बादल छटने की।
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संग्रह की समस्त कवितायेँ
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07 - श्मशान
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