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मजबूरी
मेरा मन और मैं
उड़ जाना चाहते हैं
दूर...खुले गगन में,
उड़ते पंछियों की तरह।
मिल जाना चाहते हैं वैसे
जैसे...नदिया मिलती है
किसी सागर से।
पर...जब भी सोचता हूँ
निकलना बाहर
सांसारिक पिंजरे से
हो जाता हूँ बेबस
पैरों में पड़ी
रिश्तों की जंजीरों से।
सोचता हूँ तोड़ना
वो सारी जंजीरें,
वो सारे बंधन
जो रोके हैं मुझे
विचरने को स्वच्छन्द आकाश में,
मिलने को उमड़ कर
किसी सागर से।
पर...हो जाता हूँ नाकाम,
आ जाता है हर बार
आँखों के सामने,
खुद का
बूढ़े बाप की लाठी होना,
माँ की आँखों की ज्योति होना,
होना छोटों का सहारा,
फिर....
लौट आता हूँ
इसी पिंजरे में
और देखने लगता हूँ
स्वप्न फिर से
आकाश में उड़ने का,
सागर से मिलने का।
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संग्रह की समस्त कवितायेँ
01 - मेरा भारत महान
02 - रहस्य जीवन का
03 - भूख
04 - इच्छाएँ
05 - बचपन की बेबसी
06 - सत्यता
07 - श्मशान
08 - कुदरत की रचना
09 - नारी के विविध रूप
10 - मानव
11 - याद तुम्हारी
12 - मानवता की आस में
13 - ऐ दिल कहीं और चलें
14 - अकाट्य सत्य
15 - कोई अपना न निकला
16 - उस प्यारे से बचपन में
17 - मेरा अस्तित्व
18 - मजबूरी
19 - डर आतंक का
20 - मौत किसकी
21 - जीवन सफर
22 - नारी
23 - सुनसान शहर की चीख
24 - एक ज़िन्दगी यह भी
25 - पिसता बचपन
26 - ग़मों का साया
27 - खामोशी
28 - तुम महसूस तो करो
29 - अपने भीतर से
30 - फूलों सा जीवन
31 - सत्य में असत्य
32 - स्वार्थमय सोच
33 - पत्र
34 - मानव-विकास
35 - यही नियति है?
36 - अंधानुकरण
37 - अन्तर
38 - वृद्धावस्था
39- जीवन-चक्र
40- आज का युवा
41-करो निश्चय
42- ज़िन्दगी के लिए
43- घर
44- अनुभूति
45- कलम की यात्रा
46- सुखों का अहसास
47- कहाँ आ गए हैं
48- किससे कहें...
49- आने वाले कल के लिए
50- तुम्हारा अहसास
51- दिल के करीब
कविता संग्रह