मानव
रचनाकार --
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
इस जहाँ को देख वीरान,
खुदा ने इंसान बनाया था।
सुगंध मानवता की तो,
रंग शांति का घोला था।
बाद मुद्दतों के खुदा ने
अपनी रचना को निहारा,
रह गया देखकर हैरान कि
उसने क्या बना डाला?
न होकर मात्र रचना
स्वयं रचनाकार बन गया,
किया अनोखा निर्माण तो
रुपया बना डाला।
है पागल मानव अब
इसी रचना के प्यार में,
रंग और गंध उसमें
लहू का मिला डाला।
नासमझ था अतीत में
न खुदा का समझ सका,
है समझदार वर्तमान में तो
खुद को खुदा समझ बैठा।

