श्मशान
रचनाकार --
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
श्मशान
मानव का अंतिम ठहराव,
आता है यहाँ वैसी ही हालत में,
आया था जैसा इस जग में।
लिए हाथों को खाली,
सहारा काँधों का लिए।
इसी अंतिम पड़ाव पर
मानव
रह जाता है बिलकुल अकेला,
छोड़ जाता है सभी
सांसारिक ग़म और खुशियाँ।
थे जो कल तक उसके अपने
अब उन्हें भी नहीं जानता,
न उन्हें पहचानता।
सोकर चिरनिद्रा में अब
न जागने को कभी भी
मिलने को उसी तत्त्व में
बना था जिससे स्वयं कभी भी।
यही सत्य, परम सत्य है
इस मानव जिन्दगी का,
पर....वह
जानकर भी सब
रहता है अनजान बना।

